पिछले दिनों मुझे उत्तराखंड की हसीं वादियों में जाने का मौका मिला| वहां के मनमोहक वातावरण और अछूत कुदरती सुन्दरता का रसास्वादन करते हुए मेरा मन यह सोच कर विचलित हो उठा कि स्वार्थी मानव ने उन्नति के नाम पर जो कुदरत की अनदेखी की है और इसका अंधाधुन्द हनन किया है, उससे प्रकृति कितनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है| ऐसा लगता है मानो संगीत से सुर छिन गए हों| बस इन्ही विचारों को मैंने निम्न पंक्तियों में पिरोया है:
कुचल दिया है कुदरत को;
अपने स्वार्थपूर्ण अरमानो तले;
उन्नति-तरक्की बस अपनी है देखी ;
उजड़ जाये चाहे बगिया ही भले ||
सीमेंट के जंगल बसा दिए ;
बना डाले देत्याकार कारखाने अनेकानेक ;
लुप्त हुए फूल, लुप्त हुए पशु;
समझे पर स्वयं को बड़ा ही नेक||
ऐसा लगता है मानो तितली से रंग उड़ गए हों;
और पौधे आदि गए हों सब सूख;
और मानो जैसे चिड़िया चेह्कना भूल गयी हो;
खा गयी सब कुछ मानव की यह अंधी भूख ||
ले जा रहा एक भयावह दुनिया कि ओर;
करे अमूल्य संसाधनों का अंधाधुंध हनन;
स्वर्ग सी दुनिया बनी है एक मरुस्थली;
पर ये कृपण मानव तो है अपनी ही धुन में मगन||
उन्नति वह नहीं जो तबाही लाये;
और घुटा दे नाज़ुक कुदरत का दम;
अतः धरा- रक्षा हमारा परम कर्तव्य है;
आओ आज यही संकल्प ले हम||
और घुटा दे नाज़ुक कुदरत का दम;
अतः धरा- रक्षा हमारा परम कर्तव्य है;
आओ आज यही संकल्प ले हम||
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