मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।
-By Dr. Harivansh Rai Bachhan

Monday, April 11, 2011

संगीत

ये लघु कविता मैंने पारंपरिक भारतीय संगीत के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने हेतु लिखी है ,,,,

सात सुरों का एक अदभुत संगम है संगीत,
असीम प्रेरणादायक एवं सुखदायक है संगीत |
प्रकाश के वेग से भागती इस जिन्दगी में ,
एक अनोखा सा ठहराव है संगीत ||

थक- हार चुके मन में जब जाता है संगीत ,
एक नई उमंग व चमक से भर देता है संगीत |
रागों की वह मंगलध्वनि कानों का स्पर्श जब करती है ,
बुझी हुई सी बगिया को प्रकाशित कर देता है संगीत ||

वर्षों की अडिग तपस्या से ही आता है संगीत ,
आत्मा- परमात्मा के बीच का पवित्र नाता है संगीत |
तानो , रागों, बंदिशों आदि से सुस्सजित ,
कुदरत के कण-कण में समता है संगीत ||

Thursday, December 30, 2010

Kudrat ka hanan....

पिछले दिनों मुझे उत्तराखंड की हसीं वादियों में जाने का मौका मिला| वहां के मनमोहक वातावरण और अछूत कुदरती  सुन्दरता  का  रसास्वादन करते हुए मेरा मन यह सोच कर विचलित हो उठा कि स्वार्थी मानव ने उन्नति के नाम पर जो कुदरत की अनदेखी की है और इसका अंधाधुन्द  हनन किया है, उससे प्रकृति कितनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है| ऐसा लगता है मानो संगीत से सुर छिन गए हों| बस इन्ही  विचारों को मैंने निम्न पंक्तियों में पिरोया है:

कुचल दिया है कुदरत को;
अपने स्वार्थपूर्ण अरमानो तले;
उन्नति-तरक्की  बस  अपनी  है देखी ;
उजड़  जाये  चाहे  बगिया  ही  भले ||

 सीमेंट के जंगल बसा  दिए  ;
बना  डाले  देत्याकार  कारखाने  अनेकानेक ;
लुप्त हुए फूल, लुप्त हुए पशु;
समझे पर स्वयं को बड़ा ही नेक||

ऐसा लगता है मानो तितली से रंग  उड़ गए हों;
और  पौधे आदि गए हों सब सूख;
और मानो जैसे चिड़िया चेह्कना  भूल  गयी हो;
खा गयी सब कुछ मानव की यह अंधी भूख ||

ले जा रहा एक भयावह दुनिया कि ओर;
करे अमूल्य संसाधनों का अंधाधुंध हनन;
स्वर्ग सी दुनिया बनी है एक मरुस्थली;
पर ये कृपण मानव तो है अपनी ही धुन में मगन||

उन्नति  वह नहीं  जो तबाही लाये;
और घुटा दे नाज़ुक कुदरत का दम;
अतः धरा- रक्षा हमारा परम कर्तव्य है;
आओ आज यही संकल्प ले हम||

Monday, December 20, 2010

Udaaseen man ki daastan... :-(

जब कोई इंसान अपने चाहने वालो का साथ खो देता है , तो उसे कितना बुरा लगता है; उसके दिल को कितनी ठेस पहुचती है; और जब किसी इंसान के सभी चाहने  वाले जिन्हें वो अब तक अपना समझता रहा, वे उससे दूरियां बना ले ; और जब उसे ये महसूस वो की अबे उसके दोस्त दोस्त नहीं रहे, तो उस इंसान  के मन पर और आत्मा पर क्या गुज़रती है; उसी को मैंने अपनी इस कविता में वियक्त  करने का प्रयास किया है;.........ऐसे दुखद समय में इंसान को कैसा लगता है, उन्ही भावों को मैंने इन पंक्तियों में उकेरा है: 
 
बात-बात पर खुश हो जाने की आदत थी मेरी;
यूँ  ही औरों  से उम्मीद  बाँधने  की आदत थी मेरी||

पर आज  मेरे  मन  में  एक  सूनी - सी  उदासी  छाई है
इस   तन्हा   जीवन  की असलियत   सामने  आई  है||

मैं  ठहरा पागल  जो  उम्मीद  लगाये   रहता  था , 
"ये  हैं  मेरे  हमसफ़र " गौरवान्वित  हो संसार  से  कहता  था||

पर आज  इसी  गर्व  का  खोखलापन   सामने  आया  है;
उन्हें  मेरा  मजाक  उड़ाते  देख  मेरा  भी  जी  भर  आया  है||

ऐसा  लगता  है  मानो  एकाएक  ही बगिया  उजाड़  गयी  हो;
मरुस्थल  रुपी  एस  दुनिया  से   मेरी टहनी  उखड  गयी  हो||

आखों  में  मेरे  आँसू  हैं  और  दिल  में  है  खीज;
ह्रदय  विचलित  हो उठा  है , पनपा  है  टीस  का  बीज||

मैंने  सदा  प्रयत्न  किया  कि   उनके  साथ- साथ  चलूँ ;
पर अपनी  "एहमियत  " जान  कर , अबी  क्या  ही अपने  हाथ  मलूँ ||

देख  लिया  मैंने  की औरो के  लिए  मैं  क्या  चीज़  हूँ ;
एक   चपचप   बोलने  वाला ; नगण्य  सा  नाचीज़  हूँ|| 

आत्मा है मेरी फूट-फूट कर रोई, पर अब मैं समझ गया हूँ;
ऐसी आशावादी प्रवृति को छोड़ अब मैं संभल गया हूँ ||

आगे  से  कभी  भी  इतनी  उम्मीद  ना  बांधूंगा ;
आखों  मे औरों की अपनी  तस्वीर  देख ; अब  कभी  वहां  न  झाकूंगा ||