मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।
-By Dr. Harivansh Rai Bachhan

Saturday, December 11, 2010

amol ka shukriya...

ये शायरी मेरे दिल से निकली है मेरे प्रिय मित्र अमोल के लिए:-

हे मेरे प्रिय मित्र अमोल
मैं हूँ आपका आभारी कि
आपने मुझे दिया है ये मौका अनमोल
पेश कर सकूँ मैं भी शायरी ताकि

मुझे आपने बहुत भावुक कर दिया
क्यूंकि मुझे इतना काबिल समझा
तो मैंने भी शायरी का एक घूँट पिया
करना गुस्ताखी माफ़ क्यूंकि अभी मैं नहीं हूँ मंझा

आज के लिए इतना काफ़ी है
उम्मीद है आपको मेरी भी पंक्तियाँ पसंद आएँगी
बहुत बढ़िया न होने के लिए माफ़ी है
पर शायद आगे की शयरी और ज्यादा भाएँगी

उभरता शायर
अभिषेक तायल

1 comment: