मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।
-By Dr. Harivansh Rai Bachhan

Thursday, December 30, 2010

Kudrat ka hanan....

पिछले दिनों मुझे उत्तराखंड की हसीं वादियों में जाने का मौका मिला| वहां के मनमोहक वातावरण और अछूत कुदरती  सुन्दरता  का  रसास्वादन करते हुए मेरा मन यह सोच कर विचलित हो उठा कि स्वार्थी मानव ने उन्नति के नाम पर जो कुदरत की अनदेखी की है और इसका अंधाधुन्द  हनन किया है, उससे प्रकृति कितनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है| ऐसा लगता है मानो संगीत से सुर छिन गए हों| बस इन्ही  विचारों को मैंने निम्न पंक्तियों में पिरोया है:

कुचल दिया है कुदरत को;
अपने स्वार्थपूर्ण अरमानो तले;
उन्नति-तरक्की  बस  अपनी  है देखी ;
उजड़  जाये  चाहे  बगिया  ही  भले ||

 सीमेंट के जंगल बसा  दिए  ;
बना  डाले  देत्याकार  कारखाने  अनेकानेक ;
लुप्त हुए फूल, लुप्त हुए पशु;
समझे पर स्वयं को बड़ा ही नेक||

ऐसा लगता है मानो तितली से रंग  उड़ गए हों;
और  पौधे आदि गए हों सब सूख;
और मानो जैसे चिड़िया चेह्कना  भूल  गयी हो;
खा गयी सब कुछ मानव की यह अंधी भूख ||

ले जा रहा एक भयावह दुनिया कि ओर;
करे अमूल्य संसाधनों का अंधाधुंध हनन;
स्वर्ग सी दुनिया बनी है एक मरुस्थली;
पर ये कृपण मानव तो है अपनी ही धुन में मगन||

उन्नति  वह नहीं  जो तबाही लाये;
और घुटा दे नाज़ुक कुदरत का दम;
अतः धरा- रक्षा हमारा परम कर्तव्य है;
आओ आज यही संकल्प ले हम||

Monday, December 20, 2010

Udaaseen man ki daastan... :-(

जब कोई इंसान अपने चाहने वालो का साथ खो देता है , तो उसे कितना बुरा लगता है; उसके दिल को कितनी ठेस पहुचती है; और जब किसी इंसान के सभी चाहने  वाले जिन्हें वो अब तक अपना समझता रहा, वे उससे दूरियां बना ले ; और जब उसे ये महसूस वो की अबे उसके दोस्त दोस्त नहीं रहे, तो उस इंसान  के मन पर और आत्मा पर क्या गुज़रती है; उसी को मैंने अपनी इस कविता में वियक्त  करने का प्रयास किया है;.........ऐसे दुखद समय में इंसान को कैसा लगता है, उन्ही भावों को मैंने इन पंक्तियों में उकेरा है: 
 
बात-बात पर खुश हो जाने की आदत थी मेरी;
यूँ  ही औरों  से उम्मीद  बाँधने  की आदत थी मेरी||

पर आज  मेरे  मन  में  एक  सूनी - सी  उदासी  छाई है
इस   तन्हा   जीवन  की असलियत   सामने  आई  है||

मैं  ठहरा पागल  जो  उम्मीद  लगाये   रहता  था , 
"ये  हैं  मेरे  हमसफ़र " गौरवान्वित  हो संसार  से  कहता  था||

पर आज  इसी  गर्व  का  खोखलापन   सामने  आया  है;
उन्हें  मेरा  मजाक  उड़ाते  देख  मेरा  भी  जी  भर  आया  है||

ऐसा  लगता  है  मानो  एकाएक  ही बगिया  उजाड़  गयी  हो;
मरुस्थल  रुपी  एस  दुनिया  से   मेरी टहनी  उखड  गयी  हो||

आखों  में  मेरे  आँसू  हैं  और  दिल  में  है  खीज;
ह्रदय  विचलित  हो उठा  है , पनपा  है  टीस  का  बीज||

मैंने  सदा  प्रयत्न  किया  कि   उनके  साथ- साथ  चलूँ ;
पर अपनी  "एहमियत  " जान  कर , अबी  क्या  ही अपने  हाथ  मलूँ ||

देख  लिया  मैंने  की औरो के  लिए  मैं  क्या  चीज़  हूँ ;
एक   चपचप   बोलने  वाला ; नगण्य  सा  नाचीज़  हूँ|| 

आत्मा है मेरी फूट-फूट कर रोई, पर अब मैं समझ गया हूँ;
ऐसी आशावादी प्रवृति को छोड़ अब मैं संभल गया हूँ ||

आगे  से  कभी  भी  इतनी  उम्मीद  ना  बांधूंगा ;
आखों  मे औरों की अपनी  तस्वीर  देख ; अब  कभी  वहां  न  झाकूंगा ||

Monday, December 13, 2010

Abhibhavakon ki Mamta..


अपने जिगर के टुकड़े को जाब माँ-बाप स्कूल भेजते हैं तो उनकी आखों में जो सपने उमड़ते हैं उसी पर आधारित है मेरी ये कविता "अभिभावकों की ममता" | माता- पिता अपनी संतान से कितना  प्यार और दुलार करते हैं उसी को मैंने इस कविता में व्यक्त करने का प्रयास किया है:-

बस में बैठा मैं स्कूल जा रहा था;
बारिश के मौसम का आनंद मैं पा रहा था;
तभी अगले स्टॉप पर रुकी हमारी बस;
बच्चों को लेने जो खड़े थे पीढ पर, बस्ता कस||

अभिभावकों को आखों में था भविष्य  का उजाला;
अपनी संतान के लिए थी उनकी आखों में उमंग की हाला;
इन गहरे भावों को मैं बालपन में ही भांप  गया;
अपने संतान  के प्रति उनके दुलार  को पल भर में ही नाप गया||

यह प्यार तो है वक्त के गर्त से भी गहरा;
फूल से कोमल बच्चों का करता है सदा पहरा;
इस प्यार में होती है इतनी ताकत और सच्चाई;
देख उन आखों को  मेरी भी आखें भर आई||

उनकी बड़ी -बड़ी आखों में मानो एक गुहार थी;
एक सुन्हेरे भविष्य हेतु ईश्वर से पुकार थी;
वे दृश्य, वे भाव मैं भूल ही नहीं पाता;
इतना दृढ होता है ये माँ-बाप और संतान का नाता||

भावहीन  हो मैं ये दृश्य  देखता रहा;
माँ बाप के दुलार की गहराई समझता रहा;
ऐसा लगा जैसे आज दिल धड़क उठा हो;
मानो आज स्वर्ग में स्वर्ण कमल खिला हो||

यह कविता एक  सच्ची  घटना  पर आधारित  है जो मेरे  साथ  घटित  हुई  थी पर उसे  व्यक्त  करने  का मौका  मुझे  आज मिला  है............